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मंदसौर गोली कांड ने 2018 के विधानसभा चुनाव में छीन ली थी शिवराज की कुर्सी, लखीमपुर खीरी की आंच में झुलसेंगे योगी आदित्यनाथ?

क्या यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखीमपुर खीरी कांड के बाद आग से खेल रहे हैं? क्या कांग्रेस एक बार फिर किसानों के असंतोष को चुनावी मुद्दा बनाने में सफल होगी जैसा उसने 2018 के विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश में किया था?और सबसे बड़ा सवाल तो यह कि क्या कांग्रेस का संगठन यूपी में इतना मजबूत है कि वह मोदी-योगी की जोड़ी से पार पा सके? यूपी के लखीमपुर खीरी में किसानों की मौत के बाद ये सारे सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि 2017 में मंदसौर गोली कांड की घटना ने मध्य प्रदेश में 15 साल से निर्बाध राज कर रही बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दिया था और शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था।
क्या हुआ था मंदसौर में : 6 जून 2017 को मंदसौर में हुई पुलिस फायरिंग में छह आंदोलनकारी किसानों की मौत हो गई थी। फसलों की सही कीमत को लेकर ज़िले में किसान आंदोलन चल रहा था। सरकार पर दबाव बनाने के लिए किसान हड़ताल पर थे। दूध सड़कों पर बहाया जा रहा था। वे अपने फल और सब्जियां सड़कों पर फेंक रहे थे। उसी दौरान पुलिस और किसान आमने-सामने हो गए। मंदसौर जिले के पिपलिया मंडी बही चौपाटी पर पुलिस ने फायरिंग कर दी। उसमें 5 किसानों की मौत हो गई। बाद में एक और घायल किसान ने दम तोड़ दिया था।
कांग्रेस ने चुनाव में बनाया बड़ा मुद्दा : करीब एक साल बाद मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस ने मंदसौर गोली कांड को बड़ा मुद्दा बनाया। तब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बीजेपी को निशाने पर लिया था। चुनाव प्रचार के दौरान कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और तब कांग्रेस में रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तकरीबन हर चुनावी सभा में इसकी चर्चा की थी। कांग्रेस की किसान कर्ज माफी योजना की जड़ में भी किसानों के असंतोष को भुनाने की रणनीति ही थी।
चुनाव में क्या हुआ : विधानसभा चुनावों के कुछ महीने पहले तक कांग्रेस असंगठित और गुटों में बंटी नजर आ रही थी। माना यही जा रहा था कि कांग्रेस के लिए सत्ता हासिल करना तो दूर, बीजेपी के सामने गंभीर चुनौती पेश करना भी असंभव होगा, लेकिन जब चुनाव हुए तो बीजेपी हार गई। शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और कमलनाथ ने राज्य की बागडोर संभाली। हालांकि, 15 महीने बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के विद्रोह के चलते उनकी सरकार गिर गई और बीजेपी को फिर से सत्ता मिल गई।
मंदसौर और लखीमपुर में कई समानताएं : मंदसौर गोली कांड के करीब सवा साल बाद एमपी में विधानसभा चुनाव हुए थे। यूपी में अगले साल फरवरी-मार्च में चुनाव होने हैं। मंदसौर की तरह लखीमपुर खीरी में भी किसानों का आंदोलन सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ था। विपक्षी पार्टियां लखीमपुर खीरी कांड को सरकार की तानाशाही और निरंकुशता के रूप में प्रचारित कर रही हैं। उसी तरह मंदसौर में पुलिस फायरिंग को भी कांग्रेस ने शिवराज सरकार के तानाशाही रवैये के रूप में प्रचारित किया था। मंदसौर गोली कांड की जांच के लिए शिवराज सरकार ने न्यायिक आयोग का गठन किया था। योगी ने भी लखीमपुर खीरी कांड की जांच के लिए न्यायिक आयोग बनाई है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि यूपी की तरह एमपी भी कृषि प्रधान राज्य है। एमपी की 77 फीसदी आबादी गांवों में रहती है तो यूपी की 72 फीसदी।
…लेकिन ये मुश्किलें भी हैं : लखीमपुर कांड के बाद कांग्रेस के आक्रामक रवैये से यह स्पष्ट है कि वह यूपी में मंदसौर गोली कांड वाली रणनीति पर काम कर रही है। इस बार कांग्रेस की ओर से यह बीड़ा प्रियंका गांधी ने उठाया है, लेकिन उनके लिए चुनौतियां ज्यादा हैं। यूपी मे कांग्रेस का संगठन नाम मात्र का है। एमपी में कांग्रेस उस समय भी मुख्य विपक्षी पार्टी थी, लेकिन यूपी में कांग्रेस फिलहाल चौथे नंबर की पार्टी है। चुनावों में मुख्य मुकाबला बीजेपी और सपा के बीच होने की संभावना है। चुनावों में मोदी फैक्टर की भूमिका भी महत्वपूर्ण भूनिका निभा सकती है। नरेंद्र मोदी 2018 में एमपी में चुनाव प्रचार में ज्यादा सक्रिय नहीं थे, लेकिन यूपी में वे अभी से एक्टिव नजर आ रहे हैं।

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